राष्ट्रीय विज्ञान दिवस : उस महान भारतीय वैज्ञानिक को याद करने का दिन, जिसने दूसरों से पैसे मांगकर गढ़ दी भौतिकी में नई थ्योरी 
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राष्ट्रीय विज्ञान दिवस: उस महान भारतीय वैज्ञानिक को याद करने का दिन, जिसने दूसरों से पैसे मांगकर गढ़ दी भौतिकी में नई थ्योरी

IANS

नई दिल्ली, 27 फरवरी (आईएएनएस)। प्राचीन भारत ऋषियों और संतों के साथ-साथ विद्वानों और वैज्ञानिकों की भूमि भी थी। शोध से पता चला है कि दुनिया में सबसे अच्छा स्टील बनाने से लेकर दुनिया को गिनती सिखाने तक, भारत आधुनिक प्रयोगशालाओं की स्थापना से सदियों पहले से ही गणित और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सक्रिय रूप से योगदान दे रहा था। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस भारत की उसी वैज्ञानिक प्रगति और नवाचार के प्रति प्रतिबद्धता का एक उत्सव है।

इसकी कहानी शुरू होती है देश के महान वैज्ञानिक भौतिक-शास्त्री सीवी रमन से, क्योंकि 7 नवंबर 1888 को दक्षिण भारत के तिरुचिरापल्ली में जन्मे सीवी रमन की ही खोज थी, जिसने पूरी दुनिया को भौतिकी का वह सिद्धांत दिया, जो 'रमन इफेक्ट' कहलाया। यह बताता है कि जब प्रकाश किसी पारदर्शी पदार्थ से गुजरता है, तो उसके प्रकीर्णित (स्कैटरिंग) प्रकाश का रंग और ऊर्जा बदल जाती है।

समंदर का रंग नीला क्यों होता है? यह आकाश नीले रंग का ही क्यों दिखता है? जब इसके सही कारण का सीवी रमण को पता चला तो उन्होंने इसे प्रमाणिक तौर पर साबित करने की ठान ली, लेकिन पैसों का अभाव उनके सपनों के सामने दीवार बनकर खड़ा था।

पैसों के अभाव में विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने की सुविधा नहीं मिल रही थी, तब सीवी रमण ने सरकारी नौकरी का रुख किया। उन्होंने सरकार के वित्त विभाग की प्रतियोगिता परीक्षा में हिस्सा लिया और पहचान स्थान पाया। 1907 में कोलकाता में असिस्टेंट अकाउंटेंट जनरल के तौर पर उनकी नौकरी लग गई, लेकिन विज्ञान के प्रति उनका लगाव अभी भी बना हुआ था।

1917 में सरकारी नौकरी छोड़ उन्होंने पढ़ाना शुरू किया और वह कलकत्‍ता यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गए। यहां पढ़ाने के साथ-साथ उन्हें अपनी खोज के लिए आगे बढ़ने का अवसर मिलने लगा था। वे कलकत्‍ता में इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्‍टीवेशन ऑफ साइंस (आईएसीएस) में लगातार शोध कार्य में लगे रहे।

उन्हें खोज के लिए स्पेक्ट्रोमीटर चाहिए था, लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे। उनको भरोसा था कि उनकी खोज एक दिन भारत की ओर से भौतिक जगत के लिए क्रांतिकारी साबित होगी। उन्होंने जीडी (घनश्याम दास बिड़ला) बिड़ला को एक चिट्ठी लिखी थी और बोला कि आप मुझे पैसे दें और मैं एक साल में आपको नोबेल पुरस्कार जीतकर दिखाऊंगा।

जब जीडी बिड़ला मुश्किल से 30 साल के थे, तो फिजिसिस्ट सीवी रमन ने एक पत्र में उन्हें लिखा, "अगर आप मुझे एक खास इंस्ट्रूमेंट खरीदने के लिए 22,000 रुपए की मदद कर सकें, जिसे इम्पोर्ट करना होगा, तो मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि मुझे अपनी खोज के लिए नोबल प्राइज मिल सकता है।"

जीडी बिड़ला ने भरोसा जताया और सीवी रमण की आर्थिक तौर पर मदद के लिए हाथ बढ़ाया। ठीक एक साल के बाद नोबेल पुरस्कार किसी हिंदुस्तानी को मिल रहा था।

सीवी रमण ने एक साल में अपनी थ्योरी को सिद्ध कर दिया। उन्होंने अपनी खोज से प्रकाश की स्कैटरिंग नेचर को साबित किया, जिसे 'रमन इफेक्ट' नाम मिला।

इसी खोज को भारत में एक नई पहचान दी गई और सम्मान के तौर पर 'राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' बनाने की शुरुआत हुई। भारत सरकार ने 1986 में 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (एनएसडी) के रूप में घोषित किया था। इस दिन 1928 में सीवी रमन ने 'रमन इफेक्ट' खोज की घोषणा की थी, जिसके लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार दिया गया था। पूरे एशिया में नोबेल पुरस्कार पाने वाले वह पहले वैज्ञानिक बने थे।

--आईएएनएस

डीसीएच/डीएससी

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