"वैष्णव जन तो तेने कहिये जे, पीड़ परायी जाने रे" अर्थात सच्चा वैष्णव वही है जो दूसरों की पीड़ा को समझता है। यह भजन गुजरात के 15वीं सदी के सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक संत नरसिंह मेहता (Narsingh Mehta) द्वारा रचित है। नरसिंह मेहता को गुजराती भाषा के 'आदि कवि' और 'भक्त कवि' के रूप में जाना जाता है। यह भगवन कृष्ण के परम भक्त थे और इन्होंने 'वैष्णव जन तो' जैसे कई प्रसिद्ध भजनों की रचना की थी। जो गाँधी जी का भी पसंदीदा था। इस भजन को कई फिल्मों में इस्तेमाल भी किया गया था, और न जाने कितने प्रसिद्ध गायकों ने स्वर दिया। किन्तु इस भजन को न्याय और असली स्वरुप मिला 'मुनीश रायज़ादा' द्वारा निर्मित वेब-सीरीज़ "ट्रांसपेरेंसी-पारदर्शिता" में। वह इसलिए क्योंकि जो संदेश यह भजन हम सब को देना चाहता है वह इस वेब-सीरीज़ में भरपूर मात्रा में उपलब्ध है।
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